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Showing posts from April, 2018
*वाम जवैया* *किसान* उगावय अन्न उही मन हा दुख भूखमरी दिन काटत हावै। उबारय कोन इहाँ उनला बइठे सब ऊपर रिश्वत खावै । सबो जग जीयत खावत हे इँखरे बल मा सब राज चलावै। कमावत हे दिन रात किसान तभो हक के सुख ला नइ पावै। *गरमी* जरै पँउरी अति घाम जनावय जेठ सहीं गरमी हर आवै। सुहाय नही कउनो अब चीज दही अउ अम्मट हा मन भावै। हवा चलथे अउ लू कस लागय नानुक नानुक पेड़ सुखावै। पियास मरे सब जीव जनावर जाय कहाँ सब ताल अटावै। *कमाई* भले कतको भगवान मना नइ पूरय गा सुन पाप कमाई। कमावय जाँगर पेरय जेन उही धन मान लगे सुखदाई। बिगाड़ करौ झन दूसर के परही खुद ला करनी भरपाई। उही मनखे सुख पावत हे पर के करथे नित जेन भलाई। *सुरता* धरे हँउला पनिहारिन जावय आज नही अब वो दिन आवै। समाय हवै सुरता बस मा सनिमा कस घूमय भाव लुभावै। नवा जुग आय हवे अब तो तइहा मन के सब रीत भुलावै। सँजोय कहाँ कइसे पुरखा मन के सब चीज नँदावत हावै। *सुख-दुख* कभू दुख आय कभू सुख आवय बीच झुलै सबके जिनगानी। बरोबर चाहय मान दुनो अउ लाय दुनो झन आँख म पानी। घरो घर ठौर रहे इँखरे बस अंतर भेद बतावय बानी। निभावय पात्र सबो मनखे मन जेन लिखे भगवान कहानी। आशा देशमुख
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*मुक्ताहरा सवैया* *ठग* दुकान लगावय गाँव गली ठग चंदन बंदन माथ लगाय। ठगावत हे मनखे मन हा सब फोकट मा धन धान लुटाय । धरे पतरा ठग बाँचत हे मनखे मन के मति ला भरमाय। इँहा नइहे सुख जीयत ले सुख ठौर सबो परलोक बताय। *सीख* कमाय हवे पुरखा मन हा तुँहरे बर तो अतका धन मान। गरीब लचार जिहाँ दिखथे कर लौ भइया उँहचे कुछु दान। जबान कभू कड़ुवा झन बोलव गुत्तुर बोल हवे सुख खान। कहे सत मारग जेन चले उँखरे बर साहित हे भगवान। *घर भेदी* इहाँ बइरी बइठे घर मा अपने घर बार लगावय आग। सिखावन मानत दूसर के पर के बुध मा सुन गावय राग। सगा बस हे पइसा इँखरे नइ जानय कोन नता अउ लाग। दुखी परिवार समाज रहे सब एमन कोढ़ लगे कस दाग । *जलसंकट* बढ़े जल संकट हे गहरावय येखर खोजय कोन निदान। नदी नरवा तरिया सब सूखय जीव जनावर हे हलकान। कहूँ कर छाँव घलो नइहे छइहाँ सब खोजय होय थकान। सबो करनी मनखे करथे अब काय करे कइसे भगवान। *हनुमान जयंती* लला अवतार धरे अँजनी घर भक्त शिरोमणि हे हनुमान। दिखे मुखमंडल तेज प्रताप सबो मिल देव करे गुणगान। बसे मन मा बस राम सिया बल बुद्धि किये नइ जाय बखान। सबो दुख दारिद दूर करे बस संकट मोचन के कर ध्यान। *मशीन* विकास करे दुनियाँ नित देखव आज मशीन घरो घर छाय। मशीन करे सब काम बुता मनखे मन के बइठे अलसाय । हवै वरदान कहे जतका सुनले वतका अभिशाप कहाय। मिले तन ला सुख अब्बड़ जी तब ले तन मा बड़ रोग हमाय । आशा देशमुख
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*गंगोदक सवैया* जीवन सार प्रेम के गूँथ माला इही काम आये नही तो गियाँ तै रहे नाम के। संग जावै नही सोन चाँदी कभू जिंदगानी धरा हाँथ में राम के। रंक राजा कहाँ जानथे काल हा मोह माया सबो छूटथे चाम के। चाल धोखा ठगी साथ देवे नही आय नेकी दया हा भले काम के। आलसी सोंच आवै बने काम में भी करौं हाँथ डारे तभे वो उबासी लगै। कोन जाने समे हा मिले ना मिले थोरको काम मा ही थकासी लगै। रोज बीते समे चेत आवै नहीं देह जैसे युगों के निवासी लगै। वाह आशा अलाली मरे रोज तैं काम बूता करें मा उदासी लगै। प्रदूषण आज पानी हवा हा कहाँ शुद्ध हे जेन ला देख तेला बिमारी धरे। कारखाना मशीनी धुआँ फ़ैल गे पेड़ पौधा सबो सूख के हे मरे। जीव प्राणी सबो मार झेले इँहा काखरो कोन चिंता कहाँ हे करे। देख लागै सही आज वो गोठ हा जेन जैसे करे तेन वैसे भरे। साग भाजी साग भाजी बिसाये गये हाट तो भाव बोहार के पाव चालीस हे। चेंच भाजी घलो तो नवा आय हे दू जुरी के रुपैया तको तीस हे। फूल गोभी तुमा के पुछारी नही पाव भिंडी करेला घलो बीस हे। ताप ला गोंदली के नवे देख के आज तो जीवरा हाय लागीस हे। राजभोग भ्रष्ट नेता सिपाही अऊ संतरी न्याय माँगे कहाँ कोन जावै कहाँ। नींद भांजे इहाँ राज राजा घलो दुःख ला कोन कैसे सुनावै कहाँ। कान तोपाय हे आँख मूंदाय हे न्याव के गोड़ टूटे चलावै कहाँ। खाय मेवा मलाई करे राज जे फेर वोला चना हा सुहावै कहाँ। आशा देशमुख
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*आभार सवैया* विनत भाव गुरु पौंरी मा आभार मानौं गुरू आपके मैं दिये ज्ञान जोती अँधेरा मिटायेव । संसार के सार निस्सार जम्मो कते फूल काँटा सबो ला बतायेव। रद्दा ल रोके जमाना तभो ले हवा शीत आँधी म दीया जलायेव। माथा नवावौं गुरू पाँव मा मैं छुपे जोगनी ला चँदैनी बनायेव । काली कमाई कारी कमाई करे जेन भारी करे हाँथ काला डुबावै घलो नाम। चुप्पे हवे नाम हल्ला मचावै इहाँ लोभ के भीतरी मा करे काम। कर्जा छुटावै नही ये कभू तोर चाहे लहू खून चाहे बिके चाम। रोटी मिले दू चले जिंदगानी करो आसरा जी सबो के हवे राम। *ममा भांचा* भाँचा ममा हा चढ़े एक डोंगा तभे बीच धारे ग डोंगा गये डूब। तैहा कहानी बने आज सित्तो सियानी गियानी करे गोठ हे खूब। पानी चढ़े मूड़ के ऊपरे मार धारी उलाचा तभो बाँचगे दूब। किस्सा इही रोज होवै अभी तो कहे मा सुने मा ग भारी लगै ऊब । *होरी* होरी घलो आ गए तीर संगी बजावौ नगाड़ा रचौ गीत गा फाग । गावौ सुनावौ मया मीठ बोली सनाये रहे जी बने छंद के राग । मेटौ मिटावौ सबो बैर के भाव हाँसी ख़ुशी चाशनी के रहे पाग। खेलौ सबो संग रंगे गुलाले मया मान राखौ ग रिश्ता नता लाग। होली के आनन्द होली मनाये सबो आज ऐसे कभू ये ल कोनो भुलाये नही जाय। पीये रहे छंद के भंग जम्मो मजा ला मया के बताये नही जाय। छाये सनाये रँगे प्रेम जम्मो अऊ दूसरा रंग लगाये नही जाय। हाँसी खुसी मान आनन्द ऐसे भरे आज झोली समाये नही जाय। आशा देशमुख
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*सर्वगामी सवैया* समे चोर चौपाल सुन्ना गली मा उदासी पटागे हवे गा कुआँ घाट पानी । रद्दा पुछैया बटोही कहाँ गे मिले हे कहाँ जी मया गोठ बानी । चूल्हा बरे पेट आगी बुझाये करे राज गच्छी दबे आज छानी । लागे लुकाये समे चोर लेगे सबो चीज जुच्छा बताये कहानी। शिवरात्रि मेला भोला दुवारी हवै भीड़ भारी मनौती मनावै खड़े हाँथ जोरे। लोटा भरे दूध पानी चढ़ावै कहे भक्त देवा हरौ दुःख मोरे। आये इँहा संत साधू फकीरा खड़े रंक राजा सबो द्वार तोरे। आशा मनोकामना होय पूरा सबो भक्त आये ख़ुशी ला बटोरे। केंवट प्रसंग 1 जादू भरे पाँव तोरे हवे राम कैसे लगावौं इँहा पार गंगा। डोंगा बने काठ के मोर रामा इही जीविका मोर संसार गंगा। बानी गुहाराज के भेद भारी कहाँ कोन तारे कहाँ तार गंगा। लावै कठौती गुहाराज धोवै सियानाथ पौंरी बहे धार गंगा। 2 भैया गुहा तैं बड़े भागमानी दुवारी म तोरे ग रामा पधारे। बैकुंठवासी ग लक्ष्मी नरायेन आये तपस्या बिना देख डारे। लांनै कठौती कुटुंबी बुलाये ग पौरीं सियाराम के तैं पखारे। गंगा कहे नाम के तारिणी हौं इहाँ आज मोला गुहाराज तारे। आशा देशमुख
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