*लवंगलता सवैया*
*भ्रम*
भरे कचरा मन भीतर मा अउ संत बने बड़ ज्ञान बघारय।
बहारत हे अँगना कुरिया घर अंतस उंखर कोन बहारय।
धरे पतरा भरमावत हे भ्रम लोभ कथा धर नाव उतारय।
बतावव जी भगवान घलो हर कर्म बिना कब भाग सँवारय।
*विकास या विनाश*
कहाँ खुशहाल रहे सब जीव दिनों दिन जंगल पेड़ कटावय।
पड़ै कमती अब तो भुइयाँ छत ऊपर लोगन फ़्लैट बनावय।
बिकास कहाय बिनास हवे पर ये सच के सब रूप दिखावय।
दवा नइहे अउ रोग बढ़े बड़ संकट से अब कोन बचावय।
*नशा*
नशा बइरी धन नास करे घर मा घुसके परिवार बिखेरय।
उखारत हे सुख के जड़ ला जिनगी तन ला गिरहा कस पेरय।
लहू तन के बस चूसत हे अउ रोग समेत घलो दुख घेरय ।
खुवार करे तन के धन के अउ आखिर राख मसान म हेरय।
*ठौर नही*
नहीँ अब ठौर इँहा जग मा बिटिया महिला मन के अब देखव।
लिखे हस भाग तहीं विधना अब आव तुही मन हा सुधि लेवव।
इँहा अब रक्षक भक्षक हे घर मंदिर के बिसवास ल देवव।
फॅसे मझधार हवे नइयाँ पतवार धरो प्रभु नाव ल खेवव।
आशा देशमुख
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