*मत्तगयन्द सवैया*
1,,सावन के महिना अति पावन रोज मना मन औघड़दानी ।
मान जही सिधवा शिव हा धरले फूल पान चरू भर पानी ।
देवत हे बरदान सदाशिव हाँसत हावय मातु भवानी ।
पाप कटे सब दुःख सिरावय बोलत हे सब पंडित ज्ञानी ।
2,,,अर्जुन के रथ हाँकन लागय भूल गये किशना ठकुराई ।
पांडव पाँच खड़े रण मा अउ सौ झन हावय कौरव भाई ।
रोज मरे बुझगे कुल कौरव लोभ तरी सब होय लड़ाई ।
जीत गए सत के बल पांडव या सब मोहन के चतुराई ।
3,,,तीज तिहार उमंग भरे मइके अँगना मन भावन लागे ।
देखत हे बहिनी मन बाट निहारत जोरन बाँधन लागे ।
रीत मया बँधके भइया बहिनी घर लेवन आवन लागे ।
जावत हे मइके बहिनी मन रीत ख़ुशी मुसकावन लागे ।
4,,हाँसत खेलत बीत जही सुनले मनवा सबके जिनगानी ।
राखव प्रेम दया अउ अंतस राखव थोकिन आँखिन पानी ।
काबर तैं अटिवावत हावस रे बिरथा बल मा अभिमानी ।
ये जिनगी बरदान हरे मन राख मया मुख सुघ्घर बानी ।
आशा देशमुख
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